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ताखे पर रखी कैंची

                
                                                         
                            कैंची क्यों ताखे पर रखी है,
                                                                 
                            
दर्जी से कैंची इतनी दूर, कैसे बताओ ज़रा,
ऐसे कब तक चलेगा?

कहते हो मंज़िल चाहिए, फिर कदमों में सुस्ती क्यों है,
जब पसीने से दोस्ती नहीं, तो माथे पर गुरूर क्यों है।

भट्ठी ठंडी करके बैठे हो, लोहे से तलवारें माँग रहे,
हाथों में छाले आए बिना, जीत के त्योहार माँग रहे।

बीजों को संदूकों में रखकर, खेतों से हरियाली पूछ रहे,
बादल घर में बाँध के बैठे, नदियों से खुशहाली पूछ रहे।

दीवारों पर नक्शे टाँग दिए, पर राह किसी ने नापी नहीं,
सपनों के महल बना डाले, नींव मगर अब तक डाली नहीं।

सूरज से कहते हो ठहरो, हम अभी सोकर आते हैं,
वक़्त किसी की चौखट पर, यूँ दस्तक देकर नहीं जाते हैं।

आईना धूल से ढँका हुआ, फिर चेहरे को दोष दिया,
अपने हिस्से की सच्चाई से, जाने कब तक मुँह मोड़ लिया।

कलम अगर ख़ामोश रहेगी, इतिहास कहाँ से बोलेगा,
सच की लौ जब धीमी होगी, झूठ ही सिंहासन खोलेगा।

हिम्मत की कीमत देनी होगी, किस्मत मुफ़्त नहीं मिलती,
दरिया उन तक खुद नहीं आता, जो प्यास से लड़ना नहीं सीखते।

इसलिए उठो, औज़ारों को उनके हाथों तक पहुँचना होगा,
दर्जी की कैंची, किसान का हल, मज़दूर का हथौड़ा चलना होगा।

वरना यूँ ही सवाल उठेंगे…
ताख़े पर रखी कैंची से, आखिर कब तक कपड़ा काटकर सिलेगा?
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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