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स्वयं के फलसफे

                
                                                         
                            नाम नहीं, एक विश्वास हो तुम,
                                                                 
                            
अँधियारों में जलता प्रकाश हो तुम।
जब शब्दों की राह भटकने लगती है,
तब अर्थों का मधुर निवास हो तुम।
जहाँ बहुतों की दृष्टि ठहर जाती है,
वहाँ से तुम्हारी सोच का सफ़र शुरू करती है।
तुम प्रश्नों से डरने वाले नहीं,
उत्तर गढ़ने का हुनर रखते हो।
तुम्हारे लिए कविता केवल तुक नहीं,
जीवन का सच्चा संवाद है।
हर पंक्ति में धड़कता हुआ मन,
हर शब्द में एक नया उन्माद है।
तुम चाहते हो कि सच सिर उठाकर चले,
चरित्र कभी सौदे में न ढले।
विचार ग्रेनाइट जैसे अडिग रहें,
और मन में छल-कपट न पले।
तुम्हें फूलों की ख़ुशबू भी प्रिय है,
और काँटों का संदेश भी।
तुम मुस्कान का सम्मान करते हो,
और आँसू का परिवेश भी।
तुम्हारी कलम अगर चलती है,
तो केवल गीत नहीं लिखती;
वह टूटे हुए मनों के भीतर,
आशा की लौ भी लिखती।
रिश्तों को तुम धागों सा नहीं,
जड़ों की तरह सींचना जानते हो।
रूठे हुए चेहरों के पीछे छिपे,
दर्द को भी पहचानते हो।
यही तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान है…
सम्मान कमाना, सम्मान देना।
जीत अगर मिले तो विनम्र रहना,
हार मिले तो फिर से उठ खड़ा होना।
ईश्वर करे तुम्हारी वाणी में
सद्भाव का संगीत सदा गूँजे।
तुम्हारी लेखनी से निकला हर शब्द,
किसी थके हुए मन में उम्मीद बनकर पहुँचे।

रतन नाम केवल एक व्यक्ति का नाम न रहे,
बल्कि उस विचार का पर्याय बने,
जो सत्य, संवेदना, परिश्रम और सृजन को,
अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान मानता है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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