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सुरमई हवा हो

                
                                                         
                            तुम्हारी बातों में, अब वो तुनकमिज़ाजी नहीं है,
                                                                 
                            
ये ठहराव कैसे आ गया है?
कुछ तो बताओ,
क्या योगा-वगैरह करने लग गई हो?

या फिर ज़िंदगी ने,
कुछ ऐसे सबक़ सिखा दिए हैं,
कि हर जवाब देने से पहले,
अब ख़ामोशी से सलाह लेती हो।

पहले तो बात-बात पर,
बिजलियाँ गिरा दिया करती थीं,
अब लफ़्ज़ भी ऐसे निकलते हैं,
जैसे नदी किनारों की सुरमई हवा हो।

लगता है वक़्त ने,
तुम्हारी रूह को, थोड़ा और नायाब कर दिया है,
अब हर बात पर, नाराज़ होने के बजाय,
मुस्कुराकर, चल देना सीख लिया है।

या फिर किसी ने,
तुम्हें ये राज़ समझा दिया है,
कि हर जंग जीत लेना, ज़रूरी नहीं होता,
कुछ रिश्ते बचा लेना भी, फ़तह ही कहलाता है।

लेकिन सच-सच बताना,
ये सुकून कहाँ से डाउनलोड करी हो?
कहीं ऐसा तो नहीं,
अब स्वयं से मिलना शुरू कर दिया है।

अगर सचमुच ऐसा है,
तो उस राह का पता मुझे भी दे देना,
क्योंकि इस भागती दुनिया में,
ठहराव सबसे ख़ूबसूरत इबादत बन गया है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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