बियाबान जंगल में, अलार्म क्यों लगा रहे हो,
जंगल के राजा को, कौन सा सामान बेच रहे हो?
जिसे ख़तरे का इल्म ही नहीं, उसे डर क्यों दिखा रहे हो,
सच कम है तुम्हारे पास, इसलिए शोर मचा रहे हो।
जंगल की ख़ामोशी का भी, अपना एक क़ानून होता है,
तुम हर पत्ते को, साज़िश का बयान बना रहे हो।
राजा तो पहले ही अपने माँद में बेख़बर बैठा है,
तुम किस डर की नीलामी, उसके दरबार में लगा रहे हो?
बाज़ारों का दस्तूर, जंगलों पर मत आज़माओ,
हर साँस को, सौदा बनाकर क्यों कमा रहे हो?
जिस राह पर परिंदे, सदियों से बेख़ौफ़ उड़ते आए,
वहीं अब ख़ौफ़ के बोर्ड, क्यों लगा रहे हो?
ढीठ शेर को आईना, बेचने चले हो या अँधेरा,
आख़िर किस वहम का, कारोबार चला रहे हो?
हर आहट को ख़तरा, हर ख़ामोशी को जुर्म बताकर,
तुम किसके ज़ेहन में, धुआँ भरते जा रहे हो?
याद रखना…
बियाबान को, अलार्म की ज़रूरत नहीं होती,
उसे तो बस, इंसान की नीयत से, ख़तरा होता है।
और जो लोग हर वक़्त, ख़ौफ़ का बाज़ार सजाते हैं,
अक्सर वही, सबसे महँगे दामों पर,
सुकून बेचने का, धंधा चला रहे होते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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