सिरे से खारिज कर देना, बात न जमे मेरी तो,
लेकिन सच को कैसे रोकोगे, आँख खुले मेरी तो।
तेरी चौखट पर दस्तक देकर, लौट भी जाऊँगा मैं,
पर याद रहे, आवाज़ रहेगी, देर तलक मेरी तो।
मैं वो पन्ना नहीं जिसे तुम, पढ़कर यूँ फाड़ सको,
मेरी स्याही बोल उठेगी, कलम उठे मेरी तो।
झूठे सिक्कों की इस मंडी में, सच सस्ता हो सकता है,
पर कीमत बढ़ती जाएगी, बात चले मेरी तो।
तुम चाहो तो राह बदल लो, मुझको राह से हटा दो,
मंज़िल खुद पहचान लेगी, चाल चले मेरी तो।
सिरे से खारिज कर देना, हक़ है तुमको मेरा तो,
वक़्त मगर फैसला देगा… बात थी किसकी खरी तो।
-रतन कुमार कैथवास
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