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सिलचर की ताजा चाय

                
                                                         
                            खिड़की के पास दो कुल्हड़ रखेंगे,
                                                                 
                            
एक में अदरक की महक,
दूजे में यादों का मौसम मिलाते हैं।

बादल जब छत की मुंडेर पर दस्तक देंगे,
हम हँसकर कहेंगे…
"इतनी भी क्या जल्दी है जाने की,
बैठो, दो घड़ी दिल का हाल सुनाते हैं।"
जो बूँदें पत्तों से फिसलकर भाग रही हैं,
उन्हें हथेलियों का भरोसा दिलाते हैं।
जो मिट्टी पहली फुहार में महक उठी है,
उसकी ख़ुशबू से पुराने ख़त पढ़ जाते हैं।

चाय की भाप में कुछ ख़्वाब घोलेंगे,
इलायची-सी मीठी उम्मीदें खोलेंगे।
जो शिकवे धुएँ की तरह ऊपर उठेंगे,
उन्हें हवा के हवाले कर आते हैं।

बरसात से कहेंगे…
ज़रा धीरे बरसना आज,
किसी की पलकों पर अधूरी नींद ठहरी है,
किसी के आँगन में पहली मोहब्बत उतरी है।

फिर शाम ढले जब इंद्रधनुष लौटेगा,
हम मुस्कुराकर इतना ही कहेंगे…
हर मौसम यूँ ही गुज़र नहीं जाता,
कुछ मौसम दिल के मेहमान बन जाते हैं,
इसलिए आज बरसात को भी, सिलचर की ताजी चाय पर बुलाते हैं,
और बादलों से गिरती बूँदों को खिलखिलाना सिखाते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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