क्या ज़रूरी है, करें विषपान हम शिव की तरह,
ज़िंदगी जीने के भी, कुछ और बहाने होंगे।
सिर्फ़ जामुन ही खाए थे, बड़ी मासूमियत से,
लोग कहते हैं कि, नीले होंठों पे फ़साने होंगे।
हर सितम सह के भी, ख़ामोश रहें हम आख़िर,
क्या ज़रूरी है कि, हर ज़ख़्म दिखाया जाए।
जो भी इल्ज़ाम लगे, सर को झुकाएँ उसके,
क्या ज़रूरी है, हर इक फ़ैसला माना जाए।
हमने सच बोला तो, दुश्मन कई बन बैठे,
झूठ कहते तो, बड़े लोग हमारे होते।
हमने किरदार की दौलत को, बचाकर रक्खा,
वरना बाज़ार में, सिक्के तो हज़ारों होते।
ज़हर दुनिया का पिएँ, और दुआ भी दें उसको,
क्या यही प्रेम का दस्तूर, निभाना होगा?
जो हमारे ही लहू से, अपनी प्यास बुझाए,
उसको हर बार, गले से भी लगाना होगा?
अब न हर दर्द को, मुस्कान में ढालेंगे हम,
हर किसी के लिए, विषपान नहीं हो सकता।
शिव होना भी, कोई खेल नहीं है साधो,
हर किसी से तो, हलाहल नहीं पिया जाता।
-रतन कुमार कैथवास
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