शिकायत तुमसे नहीं, तुम्हारी आँखों से था, उनमें कुछ जादू है क्या…
तुम्हारे हर ख़्वाब का बसेरा उन्हीं पलकों के पास था।
आँखें तुम्हारी हर वक़्त कोई कहानी कहती थीं,
जैसे उनमें पूरी दुनिया तैरती रहती थी।
बातें शुरू करते ही जाने क्यों बहस शुरू हो जाती थी,
एक छोटी-सी बात भी जाने कहाँ तक चली जाती थी।
तुम अपनी बात कहतीं, मैं अपनी बात सुनाता था,
और हर जवाब के पीछे एक नया सवाल आता था।
सारी बातें ख़त्म होतीं, तब जाकर सुकून आता था,
तुम्हारा माथा, जैसे बादलों से पानी निकलकर, हल्का हो जाता था।
मैं सोचता रहा… ये कैसी अजीब-सी रवायत थी,
तुमसे मोहब्बत भी थी और तुम्हारी आँखों से शिकायत भी थी।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X