हाथों से माला बुन फिर,
समझ सभी के दर्द अभी।
फूल अगर कुछ कम भी पड़ें,
धागा मत कमज़ोर कभी।
रिश्ते खुशबू से नहीं बसे,
सहनशीलता से जुड़ते सभी।
एक बूढ़ी माँ मंदिर बैठी,
मनकों में दिन गिनती रही।
हर दाने पर नाम किसी का,
अपने हिस्से चुप रहती रही।
राह किनारे बैठा बच्चा,
रोटी से पहले प्यार माँगे।
दुनिया सिक्के फेंक चली थी,
कोई उसके सिर पर हाथ न धरे।
पत्थर जितने राह में आए,
उतने सबक़ सफ़र ने लिखे।
ज़ख़्मों ने ही सिखला डाला,
किसके आँसू सच में बहे।
जिसने अपनों को खोया होगा,
वो चुप रहकर भी रोता है।
भीड़ हमेशा शोर मचाती,
दर्द अकेला ही सोता है।
एक फ़कीर ने इतना बोला,
"दिल का दरिया सूख न जाने।"
रोटी आधी बाँट सको तो,
रब भी घर का रास्ता जाने।
साँझ ढली तो दीप ने पूछा,
"किसके हिस्से जलना होगा?"
मैंने हँसकर बात कही बस,
"जिसका मन हो अँधियारा अभी।"
काँटों से भी सीखो यारो,
बिना शिकायत पहरा देना।
फूल तो इक मौसम ठहरें,
दर्द निभाता उम्र सभी।
जब भी कोई टूटे भीतर,
फ़ैसला करने मत बैठो।
पहले उसके पास तो बैठो,
शायद केवल उसकी सुनना ज़रूरी।
हाथों से माला बुन फिर,
समझ सभी के दर्द अभी।
जो आँसू की क़ीमत जाने,
वही इन्सान है सचमुच अच्छा।
नेह के धागे टूट न जाएँ,
यही दुआ है आज सभी।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X