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सजदा उस एहसास को करता हूँ

                
                                                         
                            तेरे दर की वीरानियाँ हमें खींच लाई,
                                                                 
                            
ये कैसे मुमकिन कि हमने सजदा ही न किया,
बाग़-ए-बहार का रास्ता भी तेरी चौखट से होकर गया।

पहली दफ़ा जब उस गली में क़दम रखा,
हवा ने भी अदब से अपना रुख़ मोड़ लिया।
सूखे हुए पत्तों ने जैसे कान में कहा,
"जिसे ढूँढ़ते हो, उसने कभी यहीं इंतज़ार किया।"

दीवारों पर धूप के कुछ धुँधले से निशाँ थे,
लगता था किसी ने बरसों पहले
अपनी दुआओँ का उजाला यहाँ छोड़ दिया था।
मैंने ख़ामोशी को छुआ,
उसने मेरा नाम लेकर जवाब दिया।

आँगन में एक बूढ़ा दरख़्त खड़ा था,
शाख़ें थकी हुई थीं, मगर उम्मीद ज़िंदा थी।
उसने मुस्कुराकर कहा,
"बहारें फूलों से नहीं आतीं,
किसी के लौट आने की आहट से आती हैं।"

मैंने तेरे दर पर कोई ख़्वाहिश नहीं रखी,
बस अपना अहंकार उतारकर रख दिया।
जो झुकने से डरता था उम्र भर,
उसी ने आज अपना आसमान छोटा कर लिया।

फिर न जाने कहाँ से खुशबू चली आई,
बाग़-ए-बहार जैसे साँस लेने लगा।
सूखी टहनियों पर हरियाली उतर आई,
और हर फूल ने तेरे नाम का रंग ओढ़ लिया।

तब समझ आया,
वीरानियाँ कभी मंज़िल नहीं होतीं,
वे तो इम्तिहान का पहला दरवाज़ा होती हैं।
जो उन्हें पार कर ले,
उसी के हिस्से बाग़-ए-बहार की सुबह होती है।

अब जब भी उस राह से गुज़रता हूँ,
सजदा ज़मीन को नहीं, उस एहसास को करता हूँ।
क्योंकि दर तो पत्थरों का बना था,
मगर उसके भीतर रहने वाले यक़ीन ने
हर मुसाफ़िर को गुलिस्ताँ कर दिया।
-रतन कुमार कैथवास
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3 महीने पहले

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