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सच की राह चलने वाले की, कभी हार नहीं

                
                                                         
                            बादल तो हैं, मगर बरसात नहीं,
                                                                 
                            
बातों में पहले जैसी, वो बात नहीं,
चेहरों पर हँसी है, दिल में जज़्बात नहीं,
रिश्तों में अब, पहले-सी सौगात नहीं।

खेतों में मेहनत है, अनाज नहीं,
मेहनतकशों के, हिस्से में राज नहीं,
वादों की मंडी में, आवाज़ नहीं,
सच कहने वालों का, कोई लिहाज़ नहीं।

चूल्हे में आग है, मगर पकवान नहीं,
आँखों में नींद है, मगर अरमान नहीं,
भीड़ तो बहुत है, मगर इंसान नहीं,
दिल में मोहब्बत है, मगर सम्मान नहीं।

नदियों में पानी है, धूप नहीं,
फूलों में ख़ुशबू है, मगर बहार नहीं,
शब्दों की महफ़िल है, मगर विचार नहीं,
जीत का जश्न है, मगर सरोकार नहीं।

फिर भी उम्मीदों का, अवसान नहीं,
हौसलों के आगे, कोई आसमान नहीं,
मंज़िल मिलेगी, ये ख़याल बेकार नहीं,
जिस दिल में आग हो, उसकी हार नहीं।

मरहबा, वक़्त चाहे जितना भी इम्तिहान ले,
सच की राह चलने वाले की, कभी हार नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 दिन पहले

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