हिम्मत भी दे कि टूट के बिखरूँ अगर कभी,
ऐसे हौसलों के हाथ मुझे बार-बार दे।
दौलत नहीं, शोहरत नहीं, ऊँचा मकाम नहीं,
बस एक साफ़ ज़मीर मुझको उधार दे।
सज्दे में सिर झुके तो रियाकारी न साथ हो,
ऐसी दुआ को अश्क़ का सच्चा निखार दे।
दुश्मन भी सामने हो तो इंसाफ़ कम न हो,
सीने में इतनी रौशनी, इतना विचार दे।
जब दर्द अपनी हद से भी आगे निकल चले,
लब पर तबस्सुमात का फिर इख़्तियार दे।
रिश्तों में तल्ख़ियाँ हों तो लहजा न टूटने दे,
हर बात में मोहब्बत की थोड़ी-सी धार दे।
मंज़िल मिले न मिले, ये शिकायत न हो कभी,
चलने का हौसला हो, वही ऐतबार दे।
ऐसी नज़र दे जो हर अँधेरे में नूर ढूँढ़ ले,
पत्थर में भी छिपे हुए दरिया को धार दे।
आख़िर में जब हिसाब हो मेरी तमाम उम्र का,
लोगों के दिल में बस यही लिख दे :--
ये शख़्स दर्द बाँटता रहा, किसी को न हार दे।
दिल में वो रौशनी, वो यक़ीं, वो ऐतबार दे,
हर ग़म की शाम को भी सहर सा निखार दे।
-रतन कुमार कैथवास
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