सिंदूरी शाम न ढल जाए,
आने में कुछ देर न हो जाए,
समझाऊँ कैसे मैं उसके मन को,
थोड़ा इंतज़ार भी कर ले तो क्या लुट जाएगा...
मैंने हवाओं से कहा,
ज़रा उसकी बेचैनी को बाँधकर रखना,
मैं रास्तों की धूल समेटता हुआ,
बस कुछ ही पल में पहुँचने वाला हूँ।
मगर उसका दिल भी अजीब मुसाफ़िर निकला,
घड़ी की हर टिक-टिक को,
जुदाई का फ़रमान समझ बैठा।
सूरज भी जाते-जाते कह गया,
"मिलना मुक़द्दर में हो तो अँधेरा भी
रास्ता नहीं रोक सकता।"
मैंने चाँद को गवाह बनाया,
सितारों से अर्ज़ की,
"उसकी पलकों पर उम्मीद का एक दिया जला देना,
आज मेरी मजबूरी को बेवफ़ाई मत बनने देना।"
वो बोला…
"इंतज़ार की भी एक उम्र होती है,
हर साँस किसी की राह नहीं देख सकती।"
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"उम्र नहीं, नीयत थकती है,
मोहब्बत अगर ज़िंदा हो,
तो कुछ लम्हे सदियों पर भी भारी नहीं पड़ते।"
फिर दरिया ने किनारे से धीरे से कहा,
"जो समंदर तक पहुँचने का इरादा रखते हैं,
वो मोड़ों से शिकायत नहीं किया करते।"
इतने में वह दूर से आता दिखाई दिया,
चेहरे पर थकान थी,
मगर आँखों में मिलने की वही पहली-सी चमक।
उसने बस इतना कहा…
"माफ़ करना, रास्ते रोकते रहे।"
मैंने हँसकर जवाब दिया…
"रास्ते नहीं रोकते जनाब,
इरादे रोकते हैं,
तुम आ गए, इसका मतलब है,
मोहब्बत आज भी अपने वादे पर क़ायम है।"
फिर सिंदूरी शाम चुपचाप रात की बाँहों में उतर गई,
और चाँद ने मुस्कुराकर कहा…
"जो लोग थोड़े इंतज़ार से घबरा जाते हैं,
उन्हें अक्सर उम्र भर का साथ नसीब नहीं होता।
इबादत की सबसे बड़ी परीक्षा,
वक़्त से नहीं…, सब्र से जीती जाती है।"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X