जीवन रथ के पहिये से तुम, सारी जंजीर हटा दो,
सूनी राहों से तुम जाकर, तहरीर हटा दो।
कदमों की हर आहट से तुम, आवाज़ हटा दो,
सावन के हर बादल से तुम, बरसात हटा दो।
सपनों की आँखों से तुम, ख्वाबों की रात हटा दो,
दरिया की हर लहर से तुम, फिर से सैलाब हटा दो।
नावों से तुम पतवार हटा दो, मझधार हटा दो,
मंज़िल की ओर बढ़ते राही से, उसका प्यार हटा दो।
दिल से तुम धड़कन हटा दो, धड़कन से जज़्बात हटा दो,
सूरज से उसकी रोशनी, चाँद से रात हटा दो।
फूलों से तुम खुशबू हटा दो, काँटों से आघात हटा दो,
जीवन के हर रंग से तुम, सारे हालात हटा दो।
लेकिन इतना कर पाओ तो, एक काम और कर दो…
जीवन से उसकी नब्ज हटा दो,
धड़कते हुए सीने से तुम, एहसास हटा दो।
फिर देखो किसे कहते हो जीवन, किसे कहते हो प्राण…
जब साँस ही नहीं बाकी, तो कैसा जीवन, कैसा जहान?
जिसे चलना है, उसे राह दो, जिसे लड़ना है, हथियार दो,
जीवन को मत बाँधो इतना…
उसके हिस्से का खुला आसमान दो।
फिर देखो पेड़ों में हरियाली और कोंपल फूटेंगी,
जिसकी खुशबू में मतवाली शाम ढलेगी |
जीवन की अपनी अपनी गुंजन बेला होगी,
मुसकाने होंगी, तीरथ हो जायेगा सातों धाम |
-रतन कुमार कैथवास
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