बारिश में तरसती रूह,
तरसती ही रहती है।
क्योंकि रूह तो रूह है,
कोई भौतिक शरीर नहीं...
उस दिन बारिश,
बहुत देर तक होती रही।
लोग भीग रहे थे,
पेड़ धुल रहे थे,
मिट्टी से सोंधी-सोंधी खुशबू उठ रही थी।
मैं भी भीगता हुआ,
एक पुराने, मंदिर की सीढ़ियों पर जा बैठा।
वहाँ एक फ़क़ीर,
अपनी भीगी हुई चादर निचोड़ रहा था।
मैंने उससे कहा,
"देखो...
बारिश कितनी मेहरबान है।
जिसे छू रही है,
उसे भिगो दे रही है।"
फ़क़ीर मुस्कुराया।
बोला…
"शरीर को भिगो रही है,
रूह को नहीं।"
मैंने पूछा…
"रूह भी कभी प्यासी होती है?"
वो बोला…
"सबसे ज़्यादा, वही प्यासी होती है।
गले की प्यास,
एक घूँट पानी से बुझ जाती है।
रूह की प्यास...
कई जन्मों की, तलाश माँगती है।"
मैंने बारिश की ओर देखा।
बोला…
"फिर यह बारिश किस काम की?"
फ़क़ीर ने हथेली पर,
एक बूँद गिरने दी।
फिर बोला…
"यह बारिश,
खेतों को हरा कर सकती है,
नदियों को भर सकती है,
शरीर की धूल धो सकती है।
लेकिन अगर भीतर,
पछतावे की आग जल रही हो,
तो बादलों का पूरा समंदर भी,
उसे नहीं बुझा सकता।"
मैं चुप हो गया।
कुछ देर बाद,
एक छोटी-सी बच्ची
बारिश में हँसते हुए दौड़ी।
उसने दोनों हाथ फैलाए,
और आसमान की तरफ़ देखकर, खिलखिला दी।
मैंने पूछा…
"उसे तो देखो...
वो कितनी भीग गई है।"
फ़क़ीर बोला…
"हाँ...
क्योंकि अभी उसकी रूह पर,
दुनिया की गर्द नहीं जमी।
उसके लिए बारिश,
सिर्फ़ पानी नहीं,
एक उत्सव है।"
मैंने धीरे से पूछा…
"तो रूह की प्यास,
आख़िर बुझती किससे है?"
फ़क़ीर ने आँखें बंद कर लीं।
काफ़ी देर बाद बोला…
"सच से...
प्रेम से...
क्षमा से...
और उस सुकून से,
जहाँ इंसान,
ख़ुद से लड़ना छोड़ देता है।"
बारिश थम चुकी थी।
लोग अपने-अपने घर लौट रहे थे।
मैंने देखा,
मेरे कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे,
लेकिन भीतर,
अब भी कुछ सूखा पड़ा था।
तभी फ़क़ीर ने जाते-जाते कहा…
"याद रखना...
रूह की प्यास,
आसमान से गिरने वाली बूँदों से नहीं,
दिल से बहने वाली करुणा से बुझती है।
बारिश बाहर का मौसम बदलती है,
इबादत भीतर की ऋतु बदल देती है।"
उस दिन समझ आया,
भीगना और तर होना,
दो अलग-अलग बातें हैं।
शरीर, पानी से तर हो सकता है,
लेकिन रूह...
वह तो किसी सच्चे अपनत्व,
एक निष्कपट स्पर्श,
या एक ईमानदार प्रेम से ही भीगती है।
तभी तृप्त होती है…
-रतन कुमार कैथवास
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