जो रिश्तों को संभालना सीख गया,
सही मायनों में आज वही सबसे अमीर है।
जिसने अपनों की ख़ामोशी भी पढ़ ली,
उसके पास ज़िंदगी की सबसे बड़ी जागीर है।
सोने-चाँदी के महलों का क्या करना,
अगर घर में मुस्कुराहट ही फ़क़ीर है।
जिस आँगन में अपनापन साँस लेता हो,
वहीं हर शाम ईद है, वहीं हर सुबह दीवाली की तासीर है।
रिश्ते काँच नहीं, साँसों की तरह होते हैं,
रोज़ निभाओ, तब जाकर ज़िंदा रहते हैं।
अहंकार की एक चिंगारी,
बरसों की मोहब्बत को राख कर देती है।
बोल मीठे हों तो सूखी रोटी भी दावत लगती है,
चेहरे पर अपनापन हो तो झोपड़ी भी जन्नत लगती है।
जिस घर में एक-दूसरे की इज़्ज़त बची रहे,
वहीं ख़ुशियों की सबसे बड़ी तिजारत लगती है।
याद रखना…
दौलत विरासत बन सकती है,
मगर रिश्ते कमाने पड़ते हैं।
जिसने दिलों में अपना घर बना लिया,
उसके नाम सबसे बड़ा ख़ज़ाना पड़ते हैं।
और आख़िर में…
जिसने रिश्तों को सँभालना सीख लिया,
उसने ज़िंदगी का सबसे बड़ा हुनर सीख लिया।
बाक़ी तो सिक्कों की खनक है साहब,
असली अमीरी तो दुआओँ में सुनी जाती है।
-रतन कुमार कैथवास
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