आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रिश्ते समझ से बड़े होते हैं

                
                                                         
                            जीवन का सुखबोध किसी से छिपा नहीं है,
                                                                 
                            
बस हर कोई उसे अपनी-अपनी भाषा में पढ़ता है।
किसी को वह सफलता की सीढ़ियों पर मिलता है,
किसी को किसी अपने की हथेली थाम लेने भर में।

रुके-रुके से तेरे कदम,
बार-बार उसी मोड़ पर क्यों लौट आते थे?
उस वक़्त मैं समझता था…
शायद यह संयोग है।
आज मालूम हुआ,
कुछ रास्ते मंज़िल नहीं,
मुलाक़ातें माँगते हैं।

उस दिन तुमने पूछा था…
"क्या हर कहानी का अंत, मिलन ही होता है?"
मैंने हँसकर बात टाल दी थी।
क्योंकि उस समय,
मेरे पास उत्तर कम,
उम्र का अभिमान ज़्यादा था।

आज जब बरसों बाद,
उसी पगडंडी पर चला,
तो हवा ने पुराने पत्तों की सरसराहट में कहा…
"जिसे तुमने साधारण दिन, समझकर छोड़ दिया था,
वही तुम्हारी सबसे, असाधारण स्मृति थी।"

अब सोचता हूँ,
'चिर यौवन'-सा शब्द कहाँ से लाऊँ मैं?
जो उस उम्र की बेचैनी भी कह दे,
उसकी उजली धूप भी,
और उसकी अनकही पीड़ा भी।
शब्दकोश में शब्द मिल जाते हैं,
मगर धड़कनों का व्याकरण,
किसी किताब में नहीं लिखा होता।

इस हलचल-सी डगर पर,
हम सौ-सौ बार मिले।
कभी मुसाफ़िर बनकर,
कभी अजनबी बनकर,
कभी दोस्त बनकर,
और कभी ऐसे लोग बनकर,
जो एक-दूसरे का नाम तो जानते थे,
मगर मन नहीं पढ़ पाए।

जीवन का ताना-बाना,
धागों से नहीं,
समय से बुना जाता है।
कुछ धागे हँसी के होते हैं,
कुछ प्रतीक्षा के,
कुछ पछतावे के,
और कुछ उन ख़ामोशियों के,
जो सारी उम्र बोलती रहती हैं।

उस समय मैं कुछ समझ नहीं पाया था।
मुझे लगता था…
प्रेम केवल साथ चलने का नाम है।
अब जाना हूँ…
प्रेम तो वह है,
जो बिछड़ने के बाद भी,
तुम्हारी आदतों को,
अपने जीवन से जाने नहीं देता।
आज अगर कोई पूछे…
"क्या अब भी यक़ीन है?"
तो मैं बिना झिझक कहूँगा…
हाँ...

अब तेरे नाम की, सौगंध भी खा सकते हैं हम।
क्योंकि अब वह सौगंध,
किसी अधिकार की नहीं,
एक सम्मान की है।
वह सम्मान,
जो समय ने सिखाया...
वह विश्वास,
जो दूरियों ने कमाया...
और वह अपनापन,
जिसने कभी दावा ही नहीं किया,
फिर भी जीवन की हर प्रार्थना में,
तुम्हारा नाम सबसे पहले आया।

शायद यही जीवन का सुखबोध है…
कुछ लोग हमारे हिस्से में,
हमेशा रहने के लिए नहीं आते,
वे आते हैं,
ताकि हमें यह सिखा जाएँ कि,
रिश्ते उम्र से नहीं,
समझ से बड़े होते हैं,
और प्रेम पाने से नहीं,
निभाने की नीयत से अमर होता है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर