हर पुरानी कथाओं को, बनाओ अपने हिसाब से नया,
ये कहानी जब बनी थी, वो समय दूसरा था,
अब समय दूसरा है, कुछ तब्दीलियाँ भी करनी पड़ेंगी।
वो जो कल तक दवा थी, ज़रूरी नहीं आज भी वही हो,
ज़ख़्म नए हैं, तो मरहम की रवायत भी बदलनी पड़ेगी।
जो किताबें सदियों से, एक ही सफ़ा खोलकर बैठी हैं,
उन्हें आने वाली नस्लों की, ज़ुबान भी पढ़नी पड़ेगी।
नदी अगर अपना रास्ता, बदल सकती है समंदर तक पहुँचने को,
तो इंसान को भी, मंज़िल के लिए सोच बदलनी पड़ेगी।
सिर्फ़ विरासत का बोझ, उठाने से कारवाँ नहीं चलते,
कुछ नए कंधे, कुछ नए इरादे भी जोड़ने पड़ेंगे।
वक़्त किसी के फ़ैसलों का, उम्रभर इंतज़ार नहीं करता,
जो ठहर गए, उन्हें अपनी मंज़िलें बदलनी पड़ेंगी।
बुज़ुर्गों की सीख सिर आँखों पर, मगर इतना भी याद रखना,
हर सवाल का जवाब, बीते ज़माने की किताब में नहीं मिलता।
दीये की लौ वही रहे, तो भी बाती नई रखनी होगी,
रोशनी बचानी है तो, हवाओं से दोस्ती करनी होगी।
मक़सद अगर इंसानियत है, उसूल वही रहने देना,
बस उन्हें निभाने के तरीक़ों में, तब्दीलियाँ करनी पड़ेंगी।
हर पुरानी कथा को बनाओ नया, यही ज़माने का तक़ाज़ा है,
जो बदलते वक़्त के साथ नहीं बदले,
उन्हें इतिहास नहीं, सिर्फ़ अफ़साने याद रखते हैं।
इसीलिए कहता हूँ, समय के साथ चलो,
समय तुम्हारे साथ, रुका थोड़े ही रहेगा…
-रतन कुमार कैथवास
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