चाँदनी रात में ये पहाड़ी नदी,
पिघली हुई चाँदी जैसे बह रही है,
उसके नूर की चमक क्यों आफ़ताब-सी लग रही है।
चाँद भी आज उसकी लहरों में उतरकर ठहर गया,
लगता है रात ने उजालों का लिबास पहन लिया।
पहाड़ की ख़ामोशियों ने जब उसे आगोश में लिया,
हर पत्थर ने जैसे कोई पुराना नग़्मा कह दिया।
मैंने पूछा, "ऐ नदी! तेरा नूर इतना बेचैन क्यों है?"
वो हँसकर बोली, "इश्क़ में चाँद भी कभी-कभी सूरज हो जाता है।"
बहती रही वो, हर मोड़ पर आईना बनकर,
आसमान अपने ही चेहरे को उसमें पढ़ता रहा।
हवा ने उसकी ज़ुल्फ़ों-सी लहरों को जब सहलाया,
जंगल का हर दरख़्त देर तक सजदे में झुकता रहा।
शबनम ने फूलों से कहा, "देखो, ये कैसा करिश्मा है,"
रात की गोद में भी उजालों का दरिया बहता रहा।
कोई मुसाफ़िर किनारे बैठा देर तलक यही सोचता रहा,
क्या सिर्फ़ सूरज ही रौशनी का मालिक होता है?
तभी पहाड़ ने मुस्कुराकर धीरे से जवाब दिया…
जिस दिल में सच्चाई की लौ जलती हो,
उसे आफ़ताब से उधार रौशनी नहीं लेनी पड़ती।
इसलिए चाँदनी में भी ये नदी…
पिघली हुई चाँदी से भी ज्यादा खूबसूरत लगती है,
बल्कि ऐसे कहें कि, ये अपने ही नूर से चमकता हुआ
एक चलता-फिरता आफ़ताब लगती है।
तो सही रहेगा…
-रतन कुमार कैथवास
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