जब तेज़ आँधी में,
पूरे पेड़ की शाखाएँ,
ज़ोर-ज़ोर से डोलने लगती हैं,
उस पेड़ पर बैठे पक्षी,
घबराकर उड़ते नहीं।
मैं देर तक उन्हें देखता रहा।
जिस डाल पर वे बैठे थे,
वही सबसे ज़्यादा हिल रही थी।
मैंने मन ही मन सोचा…
"इनको डर नहीं लगता क्या?
अगर डाल टूट गई तो?"
पास खड़े एक बूढ़े चरवाहे ने,
मेरी बेचैनी पढ़ ली।
मुस्कुराकर बोला…
"जाकर उनसे पूछ लो।"
मैंने हँसते हुए कहा…
"पक्षी कब बोलते हैं?"
वो बोला…
"बोलते नहीं,
अपनी उड़ान से जवाब देते हैं।"
इतने में,
हवा और तेज़ हो गई।
शाखाएँ बहुत तेज डोलने लगीं,
पत्ते टूट-टूटकर ज़मीन पर बिखरने लगे।
लेकिन पक्षी...
अब भी शांत थे।
मैंने फिर पूछा…
"आख़िर इन्हें भरोसा किस बात का है?"
बूढ़े ने आसमान की ओर, देखा और कहा…
"उन्हें डाल से ज़्यादा,
अपने पंखों पर भरोसा है।
इसलिए आँधी उन्हें डरा नहीं पाती।
उन्हें पता है,
अगर यह सहारा छूट भी गया,
तो उड़ने की ताक़त,
अब भी उनके साथ है।"
उसकी बात सुनकर,
मैं अचानक चुप हो गया।
क्योंकि मुझे लगा,
हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परेशानी,
आँधियाँ नहीं होतीं।
हमारी सबसे बड़ी परेशानी यह होती है,
कि हमने अपना भरोसा,
हमेशा डालों पर रखा,
कभी अपने पंखों पर नहीं।
हम नौकरी को पंख समझ बैठे,
रिश्तों को पंख समझ बैठे,
दौलत को पंख समझ बैठे,
जबकि ये सब तो डालें हैं।
आज हैं,
कल टूट भी सकती हैं।
असल पंख तो,
हमारा साहस है,
हमारा हुनर है,
हमारा धैर्य है,
और गिरकर फिर से, उठ जाने की क्षमता है।
चरवाहा जाने लगा।
कुछ दूर जाकर,
बिना मेरी तरफ़ देखे बोला…
"ज़िंदगी में ऐसे पंख उगाओ,
कि किसी डाल के टूटने का, मातम न करना पड़े।
क्योंकि जिसने उड़ना सीख लिया,
वो पेड़ों का मोहताज नहीं रहता।"
मैंने फिर उन पक्षियों की ओर देखा।
आँधी अब भी चल रही थी।
पेड़ अब भी हिल रहा था।
लेकिन एक छोटी-सी चिड़िया,
अपनी चोंच से,
अपने पंख सँवार रही थी,
मानो कह रही हो…
"मौसम का काम बदलना है,
और मेरा काम उड़ना।
मैं मौसम से लड़ूँगी नहीं,
बस अपने पंखों पर भरोसा रखना नहीं छोड़ूँगी।"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X