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पहले काँटों को भी आँखों से लगा लेते थे

                
                                                         
                            सारी क़द्रें ही, सियासत में बदल डाली हैं,
                                                                 
                            
हाथ अब कोई, मिलाता है तो डर लगता है।
जिसको अपना समझा, उसने ही ज़ख़्म दिए,
कोई अपना भी, बुलाता है तो डर लगता है।

पहले काँटों को भी, आँखों से लगा लेते थे,
अब कोई फूल भी, लाता है तो डर लगता है।
वक़्त ने ऐसे तजुर्बों से, नवाज़ा हमको,
कोई वादा भी, निभाता है तो डर लगता है।

हमने हर शख़्स को, चाहत से नवाज़ा था कभी,
अब कोई प्यार, जताता है तो डर लगता है।
दिल के दरवाज़े, खुले रखते थे सबके लिए,
कोई दस्तक भी, देता है तो डर लगता है।

झूठ के शहर में, सच बोलने की क़ीमत है,
कोई सच सामने, लाता है तो डर लगता है।
चेहरे मासूम, निगाहों में मगर चालाकियाँ,
कोई नज़रें मिलाता है, तो डर लगता है।

अब भरोसे की, इमारत नहीं उठती हमसे,
कोई बुनियाद, बनाता है तो डर लगता है।
ज़िंदगी ने हमें, इतना तो सिखा ही दिया,
कोई अपना, नज़र आता है तो डर नहीं लगता है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

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