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पहाड़ों में सुराख करने की बात

                
                                                         
                            सफ़ीने में सजे हुए लोग,
                                                                 
                            
हैसियत की बात करते हैं,
हम तो पहाड़ों में सूराख करने की बात करते हैं।
महलों में पलने वाले अक्सर विरासत की बात करते हैं,
हम पसीने से लिखी हुई इबारत की बात करते हैं।

जिन्हें साहिल मिला हुआ है, वो कश्तियों का हिसाब रखते हैं,
हम तो मझधार में भी हौसलों का जवाब रखते हैं।

वो सिक्कों की खनक से अपना क़द नापते फिरते हैं,
हम किरदार की बुलंदी का आफ़ताब रखते हैं।

वो मौसम देखकर अपने इरादे बदल लेते हैं,
हम आँधियों से टकराने का जिगर रखते हैं।

सफ़ीने में बैठे लोग तूफ़ानों से डरते होंगे,
हम तो लहरों की आँखों में आँखें डालने का हुनर रखते हैं।

जिन्हें मंज़िलें विरासत में मिलीं, वो नसीबों का ज़िक्र करते हैं,
हम पथरीली ज़मीन पर अपने क़दमों की तहरीर करते हैं।

वो पूछते हैं… "तुम्हारी औक़ात क्या है?"
हम हँसकर कहते हैं…
औक़ात नहीं, औज़ार देखो,
हथौड़ा छोटा सही,
मगर इरादा इतना बड़ा है कि
हम दीवारों पर दस्तक नहीं देते,
पहाड़ों में भी सूराख करने की बात करते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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