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नूरानी ही होना चाहिए

                
                                                         
                            चेहरा तो नूरानी ही होना चाहिए,
                                                                 
                            
साज़िशों की सिलवटें चेहरे पर अच्छी नहीं लगतीं।
जो मुस्कान किसी और को गिराकर मिले,
वह मुस्कान नहीं, हार की पहली निशानी होती है।
एक शाम मैं शहर की भीड़ से गुज़र रहा था।
हर चेहरा जैसे किसी अदृश्य युद्ध से लौट रहा था।
किसी की भौंहों में गुस्सा था,
किसी की आँखों में शक,
और किसी के होंठों पर ऐसी ख़ामोशी,
जो बरसों से किसी जवाब की प्रतीक्षा कर रही थी।
मैंने एक बुज़ुर्ग फ़कीर से पूछा…
"लोग इतने कठोर क्यों हो गए हैं?
इनके चेहरों पर इतनी साज़िशें क्यों दिखाई देती हैं?"
फ़कीर मुस्कुराया और बोला…
"चेहरों को मत पढ़,
उनके भीतर के मौसम पढ़।
जिस खेत में बरसों से बारिश न हुई हो,
वहाँ दरारें दिखती हैं, फसल नहीं।"
उसकी बात मेरे भीतर उतर गई।
फिर मैंने लोगों से लड़ना छोड़ दिया,
उन्हें सुनना शुरू किया।
जिसे मैं घमंडी समझता था,
वह अपनों की बेरुख़ी से, टूटा हुआ निकला।
जो हर बात पर तंज़ कसता था,
वह बरसों से अपने ही आँसुओं का कैदी था।
जिसकी आँखों में साज़िश दिखाई देती थी,
असल में वहाँ मदद की, एक ख़ामोश पुकार बैठी थी।
तब समझ आया…
हर कड़वा लहजा बुरा इंसान नहीं होता,
कई बार वह किसी पुराने ज़ख्म की आवाज़ होता है।
हर कठोर चेहरा पत्थर नहीं होता,
कई बार वह टूटने से पहले की आख़िरी दीवार होता है।
इसलिए उनसे नफ़रत मत करो।
उनके मन की चौखट पर दस्तक दो।
पूछो…
"कहाँ दर्द है?"
"किस बात ने तुम्हारी हँसी छीन ली?"
"कौन-सी पीर है जो तुम्हें भीतर ही भीतर खा रही है?"

यक़ीन मानो,
दर्द जब बाँट लिया जाता है,
तो चेहरे अपने आप बदलने लगते हैं।

मैंने देखा है…
जिस आदमी की आँखों में कभी अंगारे थे,
वही किसी बच्चे की हँसी पर खिलखिलाकर हँस पड़ा।
जिस स्त्री के चेहरे पर बरसों की उदासी जमी थी,
उसने एक दिन उम्मीद का दीपक जलाया,
तो पूरा आँगन उजाले से भर गया।

नूर कोई इत्र नहीं,
जो बाज़ार से खरीद लिया जाए।
नूर तो उस क्षण जन्म लेता है,
जब किसी के भीतर का बोझ हल्का हो जाता है,
जब कोई पहली बार महसूस करता है,
कि दुनिया में अभी भी कोई है,
जो उसे बिना निर्णय दिए सुन सकता है।

इसलिए अगर सच में दुनिया को सुंदर बनाना है,
तो चेहरों की रंगत बदलने की कोशिश मत करो,
दिलों की गिरहें खोलने निकलो।
जिस दिन किसी की पीड़ा कम कर दोगे,
उस दिन उसके चेहरे पर जो मुस्कान खिलेगी,
वह किसी चाँदनी से कम नहीं होगी।

और तब तुम देखोगे…
नूर चेहरे से नहीं टपकता,
नूर तो उस दिल से बहता है,
जिसने दर्द से दोस्ती नहीं,
दर्द को विदा करना सीख लिया हो।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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