सूरज की बातें तेरी समझ में क्यों नहीं आती हैं,
तू भी चन्दा धीरज रख अभी, भोर से पहले बातें कर ले।
रात की चादर अभी पूरी तरह उतरी कहाँ है,
सब्र की शमा जला, अभी उजालों से मुलाक़ात कर ले।
हर चमक का अपना मौसम, अपना वक़्त हुआ करता है,
तू सितारों के साथ बैठ, कुछ देर और जज़्बात कर ले।
सूरज को भी सफ़र में, कई पहाड़ पार करने होते हैं,
तू किनारों पर बैठकर, दरिया से दो-चार बात कर ले।
जल्दबाज़ी में खिले फूल, ज़्यादा देर नहीं महकते,
ओस की बूँदों से मिल, थोड़ा सा इंतज़ार कर ले।
चाँद बोला… "मैं भी कभी, सूरज जितना होना चाहता था,"
रात हँसकर बोली… "पहले अपने नूर पर ऐतबार तो कर ले।"
भोर का दरवाज़ा, आवाज़ों से नहीं खुलता साहिब,
ख़ामोश दुआओँ सेम, अपने दिल को तैयार कर ले।
जो आफ़ताब बनते हैं, वो जलने का हुनर रखते हैं,
तू अभी अपनी रौशनी का, पहला इम्तिहान कर ले।
और सुन...
सूरज की बातें, हर किसी की समझ में नहीं आतीं,
क्योंकि वो, सिर्फ़ उजाला नहीं,
तपिश का, फ़लसफ़ा भी साथ लाता है।
तू भी ऐ चन्दा, धीरज रख,
भोर से पहले, बातें कर ले।
जब पहली किरण, ज़मीन को चूमेगी,
तब तुझे समझ आएगा…
रात का, सबसे बड़ा कमाल,
सुबह से पहले उम्मीद बचाए रखना होता है।
-रतन कुमार कैथवास
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