कैसे मेरे नग़मों की सिहरन, लुभाती है तुम्हें,
जैसे टूटकर बिजलियाँ गिरी हों, नयन से तेरे,
अब मुकाबिल नहीं है, किसी आरज़ू के लिए,
दिल ने माँगा है बस, एक ठिकाना तेरे लिए।
तेरी ख़ामोशियों में भी कुछ नग़मे मिले,
तेरी पलकों तले कितने मौसम खिले,
एक नज़र जो उठा दे तू मेरी तरफ़,
फिर कहाँ हौसला है किसी जमाने के लिए।
तेरी आँखों में जो डूबकर देख लिया,
अपनी दुनिया का हर रास्ता छोड़ दिया,
अब न दौलत की चाहत, न शोहरत की प्यास,
तू ही काफ़ी है मेरी हर दुआ के लिए।
रात तनहा थी, तभी तेरा ख़याल आ गया,
चाँद भी देखकर तुझको शरमा गया,
तेरे होने से रौशन है दिल की ज़मीं,
अब नहीं चाहिए कुछ भी अपने जहाँ के लिए।
-रतन कुमार कैथवास
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