मौन खड़ा क्यों, सूख गया सावन क्या तेरा,
रूठ गया है क्या बादल, या बदला है मन तेरा।
बूँद-बूँद को तरस रही हैं, धरती की ये राहें,
किससे ऐसी ठनी हुई है, बोल ज़रा तू देव मेरे।
बाग़ों में अब फूल नहीं हैं, काँटों का पहरा है,
तेरी ख़ामोशी के पीछे, कौन-सा दुख गहरा है।
कोयल भी अब पूछ रही है, किससे हुई तेरी लड़ाई,
किसने तेरे हिस्से का, वो मधुमास छीना है।
बोल कि किससे मतभेद है, किससे कैसी अनबन है,
क्यों तेरे चेहरे पर, छाई वीरानी की उलझन है।
बात अगर कुछ बिगड़ गई है, बैठ उसे सुलझाएँ,
कब तक अपने ही आँगन में, नफ़रत के दीप जलाएँ।
नदी किनारे प्यास खड़ी है, सागर मौन खड़ा है,
बादल के सीने में, जाने कैसा दर्द गड़ा है।
धरती की आँखों में देखो, कितने सपने सूखे,
किसकी ज़िद के कारण, सावन राह बदलकर रूठे।
मौन तोड़, अब बोल भी दे, कब तक यूँ चुप रहना है,
रूठे मौसम को मनाकर, फिर से हरा-भरा करना है।
मतभेदों की दीवारों को, मिलकर आज गिराएँ,
प्रेम की बारिश लेकर आ, फिर सावन लौटाएँ।
-रतन कुमार कैथवास
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