जो व्यक्ति अँधेरे का डर दिखाता है,
इसका मतलब…
वह अपनी कंपनी की मोमबत्ती ही बेचना चाहता है।
तुम सीधे से भी बेच सकते हो,
लेकिन ये डर दिखाने का क्या सेंस है?
डर की दुकान सजाकर,
हिम्मत का सौदा करना,
बताओ ज़रा,
ये कैसा व्यवसाय है?
अगर तुम्हारी लौ में,
सचमुच इतनी गर्मी है,
तो उसे जलाकर दिखाओ,
चीख़ों का फालतू विज्ञापन क्यों है?
सूरज कभी,
अँधेरों की नीलामी नहीं करता,
वह बस उगता है…
यही उसकी पहचान है।
नदी कभी,
प्यास का आतंक नहीं बेचती,
वह बहती है,
और प्यासे ख़ुद रास्ता ढूँढ़ लेते हैं।
जो यक़ीन बेचते हैं,
उन्हें डर की ज़रूरत नहीं पड़ती,
डर तो वही बेचता है,
जिसे अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता।
बाज़ार की सबसे ऊँची आवाज़
हमेशा सबसे सच्ची नहीं होती,
कई बार ख़ामोश उजाले,
सदियों तक रास्ते दिखाते हैं।
तुम अपनी मोमबत्ती बेचो,
मगर उसकी लौ के भरोसे बेचो,
लोगों के मन में रात बसाकर नहीं,
रोशनी का सम्मान बढ़ाओ,
अँधेरे का व्यापार नहीं…
वरना हिसाब किताब में मुनाफ़ा तो लिख जाएगा,
मगर इंसानियत भी कुछ कमायी क्या ?
ये सवाल खड़ा रहेगा…
-रतन कुमार कैथवास
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