उन्हें क्या पता, ख़ामोश रहना,
और ख़ामोश कर दिया जाना,
दो अलग-अलग बातें हैं।
एक में इंसान ख़ुद को चुनता है,
दूसरे में उससे छीन ली जाती हैं,
उसकी सारी आज़ादियाँ।
मैं बोलूँगा, तो शायद उन्हें हैरानी होगी,
मेरी आवाज़ में, मेरी ही कहानी होगी,
वे फिर कहेंगे… हमें तो पहले से पता था।
कि यह क्या कहने वाला है,
हाँ, उन्हें सब पता है, बस एक बात का इल्म नहीं…
जिस दिन ख़ामोशी टूटेगी,
उस दिन मेरी आवाज़ का मालिक,
कोई और नहीं होगा।
-रतन कुमार कैथवास
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