उसने आईने में देखकर अपने चेहरे पर थोड़ी सख़्ती ओढ़ ली,
मैंने हँसकर कहा…
"सख़्त बनकर क्या करेगा,
बाज़ू में तो तेरी बावली बैठी है,
उसे, तेरी मुस्कान का मौसम, बदल देने का हुनर आता है।"
फिर आँगन की ओर इशारा करके दादी बोली …
"घड़ों में पानी भरकर रख दो,
आज मेहमान आने वाले हैं,
और बेटा,
घर केवल साफ़ फ़र्श से नहीं,
भरे हुए बर्तनों और भरे हुए दिलों से पहचाना जाता है।"
मैंने कहा…
"एक मेहमान और भी आने वाला है,
जिसका नाम किसी सूची में नहीं,
जो दरवाज़े से नहीं,
यादों की पगडंडी से आता है।"
वो चुप रही।
उसकी ख़ामोशी ने
मेरे हर सवाल को
दीवार पर टँगी तस्वीर बना दिया।
मैंने धीरे से कहा…
"ना चाहते हुए भी
बात तो की जा सकती है,
हर बातचीत मोहब्बत का इज़हार नहीं होती,
कई बार,
रिश्तों की साँसें, बचाने का आख़िरी ज़रिया होती है।"
वो खिड़की के पास, जाकर खड़ी हो गई,
जैसे बादल,
बरसने से पहले,
अपने आँसू सँभालते हों।
मैंने फिर पुकारा…
"बिना बात किए,
तेरी नाराज़गी कैसे दूर होगी?
जो गाँठ ज़ुबान खोल सकती है,
उसे ख़ामोशी की उँगलियाँ
कभी नहीं खोल पातीं।"
वो पलटी,
आँखों में अब भी शिकवे थे,
मगर आवाज़ पहले से नरम थी।
बोली…
"तुम हर बार,
बातों से जीत जाते हो,
लेकिन याद रखना,
रिश्ते बहस से नहीं,
मनाने की आदत से ज़िंदा रहते हैं।"
मैंने मुस्कुराकर,
घड़े का पानी उसके हाथों में थमाया और कहा…
"चलो,
आज मेहमानों से पहले,
हम अपनी नाराज़गी को विदा करते हैं,
क्योंकि जिस घर में,
दो लोग एक-दूसरे से बोलना छोड़ दें,
वहाँ मेहमान नहीं,
सिर्फ़ सन्नाटा ठहरता है।"
-रतन कुमार कैथवास
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