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माँ के पानी से हार जाता हूँ, अपने ही सपनों की रवानी से

                
                                                         
                            मेरे सपनों की बैरिक में क्यों खड़े हुए हो शाम से,
                                                                 
                            
किस जंग का ऐलान है तुम्हारा, पूछूँ ज़रा इस मुक़ाम से।
मैं ख़्वाबों की सरहद पर पहरा दिए बैठा था,
तुम चले आए लहर बनकर, मेरे नींद के इंतज़ाम में।

समंदर की एक लहर अचानक मेरे ऊपर आ पड़ी,
नींद की ख़ामोश दुनिया में जैसे कोई आफ़त आन पड़ी।
मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा, साँसें भी घबराने लगीं,
ख़्वाबों की सारी कश्तियाँ आँखों के आगे डूबने लगीं।

माँ ने देखा तो बोली, बेटा, ये कैसी घबराहट है,
तेरे चेहरे पर क्यों छाई हुई डर की आहट है।
मैंने कहा, समंदर मेरे बिस्तर तक चला आया है,
मेरे सपनों का पूरा शहर लहरों में समाया है।

माँ ने पानी का पूरा गिलास मुझ पर उड़ेल दिया,
मेरे ख़्वाबों के समंदर को पल भर में समेट दिया।
मैंने आँखें मलकर देखा, न कोई लहर, न तूफ़ान था,
बस माँ का चेहरा सामने था, और पानी का एहसान था।

अब सोचता हूँ, ख़्वाब भी कितने अजीब मिज़ाज रखते हैं,
कभी समंदर बनकर आते हैं, कभी सैलाब रखते हैं।
दुनिया की हर जंग से शायद बच निकलूँ मैं आसानी से,
पर माँ के पानी से हार जाता हूँ, अपने ही सपनों की रवानी से।
-रतन कुमार कैथवास
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एक घंटा पहले

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