मगर कैसे कहूँ मैं अपने दर्द, जो इस ज़माने में हैं,
कैसे यक़ीन दिलाऊँ कि अभी कुछ उजाले बाक़ी हैं।
मेरे शहर का एहतराम सिर्फ़ इमारतों से नहीं,
बेलौस आपसी मोहब्बत की साँसों से ज़िंदा है।
ज़रा रिश्तों की नर्म-गर्माहट पर भी नज़र रखो,
कहीं कोई ख़ामोशी से इन्हें झिंझोड़ तो नहीं रहा।
आँगन में बैठकर साथ चाय पीने की रिवायत,
मोबाइल की रौशनी में कहीं खो न जाए।
बच्चों की हँसी, बुज़ुर्गों की दुआ, पड़ोस की दस्तक,
यही तो शहर की असली दौलत हुआ करती है।
दरख़्त कटेंगे तो सिर्फ़ छाँव ही कम न होगी,
रिश्तों के परिंदे भी फिर लौटकर कहाँ आएँगे।
मोहब्बत का घर बहुत मुश्किल से बनता है,
नफ़रत की एक चिंगारी उसे राख कर देती है।
अगर सचमुच अपने शहर से मोहब्बत करते हो,
तो पहले अपने लहजे को ठीक रखो।
हम विरासत में सिर्फ़ ज़मीन और मकान नहीं छोड़ते,
हम अपने किरदार, अपनी तहज़ीब और अपना ज़मीर भी छोड़ते हैं।
आओ, कुछ ऐसा भी कर जाएँ, कि आने वाली नस्लें कहें…
इन लोगों ने सिर्फ़ शहर नहीं बसाया था,
इन्होंने इंसानियत को भी सँभाल कर हमारे हवाले किया था।
-रतन कुमार कैथवास
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