ये जो तेरे विज्ञान के पैंतरे हैं,
इस पर दवा छिड़क दूँ क्या?
कुछ तो सुकून मिले...
गुरु जी से मिलना पड़ेगा,
ऐसा क्यों मुझे लगता है?
वो मुस्कुराया और बोला,
"हर सवाल का जवाब प्रयोगशाला में नहीं मिलता,
कुछ उत्तर अनुभव की धूप में पकते हैं।"
मैंने कहा…
"विज्ञान कहता है, हर चीज़ का कारण होता है,
मगर दिल की धड़कनों का हिसाब,
कौन-सी किताब रखती है?"
उसने सामने रखी रेत पर,
दो लकीरें खींचीं।
एक सीधी, दूसरी टेढ़ी।
फिर बोला…
"सीधी लकीर विज्ञान है,
टेढ़ी लकीर ज़िंदगी।
दोनों साथ चलती हों,
तभी तस्वीर पूरी बनती है।"
मैंने फिर भी ज़िद की…
"कोई ऐसी दवा तो होगी,
जिससे ये उलझन उतर जाए।"
वो हँस पड़ा।
"दवा नहीं, दृष्टि बदलनी पड़ेगी।
बीज को देखकर जो सिर्फ़ मिट्टी देखे,
उसे पेड़ कभी दिखाई नहीं देता।"
अगली सुबह,
मैं उसके साथ एक पुराने आश्रम पहुँचा।
वहाँ न बड़े उपदेश थे,
न चमत्कारों की बातें।
बस एक वृद्ध गुरु,
चुपचाप पौधों में पानी दे रहे थे।
मैंने अपनी सारी उलझनें,
एक साँस में कह डालीं।
गुरु जी मुस्कुराए और बोले…
"जब विज्ञान तुम्हें 'कैसे' बता दे,
तब भी 'क्यों' का उत्तर बचा रहता है।
और जब 'क्यों' बेचैन करने लगे,
तो उत्तर शब्दों में नहीं,
अपने भीतर खोजा जाता है।"
लौटते समय,
हवा पहले जैसी ही थी,
रास्ते भी वही थे,
मगर मेरा मन बदल चुका था।
तब समझ आया…
विज्ञान दुनिया को समझना सिखाता है,
और गुरु स्वयं को।
दोनों में विरोध नहीं,
दोनों का संग ही पूर्णता है।
जिस दिन यह बात समझ में आ जाए,
उसी दिन सबसे बड़ी दवा मिल जाती है…
मन का सुकून।
-रतन कुमार कैथवास
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