फिर क्यों हर दफ़ा कोई नया बहाना साथ लाते हो,
क्या सच में इतने व्यस्त हो, या मुझसे नज़रें चुराते हो।
मैंने तो हर लफ़्ज़ इबादत से ही सजाया था,
बताओ, कौन-सा जुमला तुम्हारे दिल को चुभाया था।
अगर मेरी ख़ता थी, तो सज़ा भी बता देते,
यूँ ख़ामोशी की दीवार खड़ी करके कहाँ जाते।
रिश्ते सवालों से नहीं, जवाबों से सँवरते हैं,
मगर तुम तो हर जवाब से पहले ही बिदकते हो।
मैं आज भी उसी मोड़ पर ठहरा हुआ मिलता हूँ,
जहाँ तुम्हारे आने की आहट रोज़ सुनता हूँ।
न शिकवा है, न कोई हिसाब माँगता हूँ,
बस इतना बता दो, क्या अब भी मुझे अपना मानती हो?
अगर दिल बदल गया है, तो साफ़-साफ़ कह देना,
झूठी उम्मीदों का दिया हर रोज़ यहाँ मत जलने देना।
यक़ीन मानो, बिछड़ना इतना दर्द नहीं देता,
जितना किसी अपने का ख़ामोश होकर बदल जाना देता।
मैंने दरवाज़ा आज भी खुला रखा है तुम्हारे लिए,
मगर लगता है रास्ता नहीं, इरादा बदल गया है तुम्हारा मेरे लिए।
बस आख़िरी बार इतना-सा सच सुनना चाहता हूँ…
दूरी घरों की थी... या फ़ासला तुम्हारे दिल में आ गया है?
-रतन कुमार कैथवास
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