दरिया का सारा दर्द अब ज्वार-भाटा हो गया है,
तेरे बिन जीने का हर मौसम सज़ा हो गया है।
किताबों में पड़ा हूँ एक सूखे गुलाब की तरह,
कभी जो महकता था तेरे छूने से, फ़ना हो गया है।
मैं कैसे यक़ीन दिलाऊँ कि साँसों पर तुम्हारा राज है,
मेरी हर धड़कन में आज भी तुम्हारी ही आवाज़ है।
तुम समझते हो कि बिछड़कर मैं बदल गया हूँ शायद,
मेरी ख़ामोशी में छिपा अब भी तुम्हारा आग़ाज़ है।
सूनी हवेली में तुम्हारी यादें बहुत हैं,
बुझ चुके चिराग़ों में भी जलती फ़रियादें बहुत हैं।
किस-किस दरीचे को बंद करूँ तेरी आहट से बचने को,
इस शून्य हुए मकान में तेरी आबादियाँ बहुत हैं।
वक़्त की धूल ने चेहरे पर कई मौसम लिख दिए,
तेरे इंतज़ार ने आँखों में कितने समंदर भर दिए।
मैंने हर पन्ने से चाहा तेरा नाम मिटा देना,
मगर तेरी याद ने किताबों के भी पन्ने भिगो दिए।
अब लौट भी आ कि दिल को कोई बहाना चाहिए,
इस वीरान ज़िंदगी को फिर से ठिकाना चाहिए।
मैं आज भी उसी मोड़ पर ठहरा हूँ तेरे वास्ते,
जहाँ से तेरी राह को मेरा हर सपना जाना चाहिए।
मेरे भीतर आज भी तेरी उलफ़त का उजाला है,
बाहर से ख़ामोश हूँ, मगर दिल में सैलाब निराला है।
तुम पूछते हो किस तरह ज़िंदा हूँ तेरे बग़ैर,
जिस्म तो मेरा यहाँ है, रूह पर नाम तुम्हारा है।
-रतन कुमार कैथवास
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