जो तैरने का हुनर जानते हैं दरिया में,
वही तो लहरों के इशारे कहाँ समझते हैं।
जो धूप में नहीं निकले कभी सफ़र लेकर,
वो रास्तों के ये अंगारे कहाँ समझते हैं।
हम अपनी प्यास लिए फिरते हैं समंदर तक,
ये प्यास क्या है, ये लोग कहाँ समझते हैं।
किनारों पर खड़े लोग फ़ैसले देते हैं,
जो डूबते हैं, वो नज़ारे कहाँ समझते हैं।
जिसे मिला हो सुकूँ सिर्फ़ साहिलों पर ही,
वो टूटती हुई कश्ती के सहारे कहाँ समझते हैं।
हमारे ज़ख़्म भी पानी में घुल गए शायद,
नदी के दर्द को किनारे कहाँ समझते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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