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खुली किताब लिख देना

                
                                                         
                            न देना ताज, दौलत, या हुकूमत की निशानियाँ,
                                                                 
                            
मेरे हिस्से में बस अपना पूरा नाम लिख देना।

अगर तक़दीर में मिलना मुकम्मल हो नहीं सकता,
किसी ख़्वाबों की बारिश में अपना पैग़ाम लिख देना।

मैं इक सूखी हुई शाख़ों का तन्हा-सा परिंदा हूँ,
अपने मौसम के माथे पर गुजरती शाम लिख देना।

तुम्हारी एक मुस्कान उम्र भर का नूर बन जाएगी,
मेरी वीरान धड़कन पर वही इन-आम लिख देना।

नज़र जब आख़िरी उठे इस फ़ानी कारवाँ से भी,
उसे बस तेरे चेहरे का हसीँ अंजाम लिख देना।

मैं अपने दर्द की दौलत किसी से बाँटता कब हूँ,
मगर तुम चाहो तो उस पर भी अपना नाम लिख देना।

जो क़िस्मत ने मिटाए हैं सभी अक्षर मोहब्बत के,
उन्हें फिर से मेरे दिल की खुली किताब लिख देना।

न जन्नत की तमन्ना है, न दुनिया की कोई ख़्वाहिश,
मेरे सज्दों के मुक़द्दर में तेरा एहतराम लिख देना।

अगर सदियों के बाद भी कोई पूछे मेरी पहचान,
तो मेरी रूह के हिस्से में तेरा नाम लिख देना।
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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