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खोना नहीं चाहते

                
                                                         
                            जिसे हासिल नहीं किया, उससे बिछड़ना भी गवारा नहीं,
                                                                 
                            
दिल के इस ख़ामोश नाते को, कोई पहचान भी देना गवारा नहीं।

पहली बार जब देखा था, बस एक मुस्कान ठहर गई थी,
बात आगे बढ़ सकती थी, मगर बढ़ाना भी नहीं चाहते हैं।

रोज़ उसी गली से गुज़रते हैं, जैसे कोई काम पड़ा हो,
असल वजह कोई पूछ बैठे, बतलाना भी नहीं चाहते हैं।

उसके शहर की बारिश, अब अपने शहर में भिगाती है,
भीगे हुए इन ख़तों को मगर, दिखलाना भी नहीं चाहते हैं।

कई दफ़ा उसने मुड़कर देखा, कई दफ़ा हमने नज़रें चुराईं,
दिल की इस छोटी-सी चोरी को, जतलाना भी नहीं चाहते हैं।

वक़्त ने लाख समझाया, हर कहानी मुकम्मल नहीं होती,
फिर भी इस अधूरी दास्ताँ को, भुलाना भी नहीं चाहते हैं।

दुआ यही है कि वो हँसता रहे, चाहे किसी और के साथ ही क्यों न हो,
अपनी चाहत की क़ीमत पर, उसकी मुस्कान चुराना भी नहीं चाहते हैं।

कुछ रिश्ते मंदिर के दीपक जैसे, दूर से ही अच्छे लगते हैं,
हाथ बढ़ाकर उनकी लौ को, बुझाना भी नहीं चाहते हैं।

इसलिए ख़ामोशी को ही अपना हमराज़ बना रखा है,
पाया नहीं है जिसको, उसे खोना भी नहीं चाहते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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