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खामोशी लिख रहा था

                
                                                         
                            ये तबस्सुम, ये हिकारत, ये आशियाँ, ये जलज़ले,
                                                                 
                            
क्यों हो रहे हैं, क्या किसी शायर ने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की?

या किसी ग़ज़ल का सच, सरे-बाज़ार कह दिया,
और आईनों ने झूठ की पैरवी, करने से इनकार किया?

किसने अल्फ़ाज़ के सीने में, इतनी आग भर दी,
कि हर मिसरा उठते ही, एक शहर सवालों में घिर गया।

किसके क़लम से निकला था, इतना बेबाक सच,
कि महफ़िल हँसती रही, और ज़मीर रोता रहा।

ये राख यूँ ही हवाओं में, नहीं बिखरी होगी,
कहीं किसी ख़्वाब का मकान, ख़ामोशी से जला होगा।

जिसे लोग एक शायर की, तन्हाई समझते रहे,
वो दरअसल पूरे ज़माने की, ख़ामोशी लिख रहा था।

लफ़्ज़ मरते नहीं, बस लहू ओढ़ लेते हैं,
जब कोई एहसास अदालत में गवाही देता है।

सवाल शायर की साँसों का नहीं होना चाहिए,
सवाल ये है कि उसकी आवाज़ किसने नहीं सुनी।

अगर किसी शायर ने सचमुच हार भी मानी हो,
तो उससे पहले यक़ीनन बहुत-से लोग, सच से मुँह मोड़ चुके होंगे।

सोचो…
जब शहर तालियाँ बजा रहा होता है,
कहीं कोई शायर अपने आख़िरी शेर में,
इंसानियत की पहली पुकार लिख रहा होता है।
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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