जीवन ऐसा नहीं होना चाहिए कि, साँसों से विश्वास उठ जाए,
इंसान अपने ही भीतर, जीते-जी बिखर जाए।
रास्ता ऐसा नहीं कि, मंज़िल का पता ही खो जाए,
और सफ़र ऐसा नहीं कि, मुसाफ़िर ख़ुद से बिछड़ जाए।
मौसम ऐसा नहीं कि, बादल बरसने से कतराएँ,
खेत ऐसे नहीं कि, बीज बोने से पहले घबराएँ,
मेहनत ऐसी नहीं कि, हाथों की लकीरें रोने लग जाएँ,
और फ़सल ऐसी नहीं कि, किसान को सपने बेचने पड़ जाएँ।
विचार ऐसे नहीं कि, चंद लफ़्ज़ों में समा जाएँ,
सवाल ऐसे नहीं कि, जवाबों से पहले बिक जाएँ,
ज़मीर ऐसा नहीं कि, सत्ता के आगे झुक जाए,
और उसूल ऐसे नहीं कि, फ़ायदे देखकर वो बदल जाएँ।
रौशनी ऐसी नहीं कि, अँधेरों से समझौता कर ले,
आग ऐसी नहीं कि, राख होने का फ़ैसला कर ले,
बुराई इतनी भी शरीफ़ नहीं कि, नेकियों में ढल जाए,
और अच्छाई ऐसी नहीं कि, हर चोट पर पिघल जाए।
प्रतिभा ऐसी नहीं कि, तारीफ़ों में खो जाए,
हुनर ऐसा नहीं कि, तालियों का मोहताज हो जाए,
कलम ऐसी नहीं कि, सच लिखने से खौफ खाए,
और शब्द ऐसे नहीं कि, आईना दिखाकर मुकर जाएँ।
प्रेम ऐसा नहीं कि, अधिकारों में क़ैद हो जाए,
रिश्ता ऐसा नहीं कि, ख़ामोशी में बर्बाद हो जाए,
इंसानियत ऐसी नहीं कि, सरहदों में बँट जाए,
और इंसान ऐसा नहीं कि, इंसान होकर भी पत्थर बन जाए।
कुछ तो अंदर जिंदापन होना ही चाहिए।
-रतन कुमार कैथवास
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