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कैसे कैसे अन्दाज़

                
                                                         
                            रात नहीं, इंसान का ख़्वाब बदलता है,
                                                                 
                            
मंज़िल नहीं, चलने का अंदाज़ बदलता है।
हौसले बुलंद हों तो रास्ते निकल आते हैं,
वक़्त नहीं, वक़्त से लड़ने का मिज़ाज बदलता है।

चेहरा नहीं, अक्सर किरदार बदलता है,
मौसम नहीं, इंसान का व्यवहार बदलता है।
जो आँधियों में भी चिराग़ जलाए रखते हैं,
उनके लिए हर अँधेरा बार-बार बदलता है।

हार नहीं, कोशिशों का हिसाब बदलता है,
ठोकरों से चलने का सलीक़ा बदलता है।
जो गिरकर भी उठने का हुनर जानते हैं,
उनके लिए गिरना भी इतिहास बदलता है।

दरिया नहीं, बहने का रुख़ बदलता है,
सफ़र नहीं, मुसाफ़िर का जुनून बदलता है।
जो तूफ़ानों से टकराने की हिम्मत रखते हैं,
उनके लिए लहरों का भी उसूल बदलता है।

दौर नहीं, दौर को देखने का नज़रिया बदलता है,
क़िस्मत नहीं, मेहनत से मुक़द्दर बदलता है।
जो अपने इरादों पर अडिग रहते हैं,
उनके आगे एक दिन ज़माने का फ़ैसला बदलता है।

याद रखना…
रात के बदलने से सवेरा नहीं होता,
ख़्वाब देखने से कोई सपना पूरा नहीं होता।
मंज़िल उन्हीं के क़दम चूमती है मित्र,
जिनके लिए मुश्किलों में ठहरना गवारा नहीं होता।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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