सच के आँचल में, बादल सिमटने लगे,
ख़्वाब आँखों में, आकर मचलने लगे,
दूर तक देखना भी, हुआ धुंधला-सा,
रात के साए, दिन में बदलने लगे।
कैसे कह दूँ कि, सँवर के तू मिल तो ज़रा,
दिल की वीरान गलियों में, खिल तो ज़रा,
वक़्त ने रंग, चेहरे के फीके किए,
मेरी नज़रों से, नज़रें मिला तो ज़रा।
धुंध छँटेगी तो, मंज़र निखर जाएगा,
दिल में दबा हुआ, सच भी उभर जाएगा,
तू जो आकर, कभी सामने बैठ जाए,
हर अधूरा-सा, क़िस्सा सँवर जाएगा।
आईने में, कई अक्स धुँधलाने लगे,
अपने ही लोग, नज़रें चुराने लगे,
किसको फ़ुर्सत है, सच का पता पूछने की,
लोग चेहरे पे, चेहरे लगाने लगे।
अब न वादों की ख़्वाहिश, न श्रृंगार की ज़िद,
न किसी झूठे ख़्वाब के, कारोबार की ज़िद,
जैसी भी हूँ मैं, वैसी ही मिलना मुझे,
बस मुलाक़ात हो, न हो बनावट की ज़िद।
-रतन कुमार कैथवास
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