कष्ट क्या है? यह प्रश्न जब भी हृदय में उतरता है,
बंद सीपी के भीतर कोई मोती निखरता है।
दर्द की हर एक लहर में कोई संदेश पलता है,
टूटकर भी आदमी फिर जीने का हुनर सीखता है।
हर पीड़ा के गर्भ में छिपा कोई नया प्रकाश है,
जिसे हम दुःख समझते हैं, वही विकास का आभास है।
बीज को मिट्टी की छाती चीरकर बाहर तो आना है,
धूप से रिश्ता बनाकर फूल बनकर मुस्कुराना है।
अँधेरों की कोख से ही भोर का जन्म होता है,
तपते हुए ललाट पर ही कर्म का चंदन होता है।
जो कली संघर्ष से डरकर कभी खिलती नहीं,
उसकी ख़ुशबू वक़्त के आँगन में फिर मिलती नहीं।
कभी पतझड़ को भी देखो, वह बहारों का पता देता है,
टूटा हुआ पत्ता भी मिट्टी को नया जीवन देता है।
ऋतुओं का बदलना ही तो प्रकृति का विधान है,
कभी हँसना, कभी रोना, ज़िंदगी की पहचान है।
जो हर मौसम को हँसकर अपने गले लगाता है,
वही शोक की सर्द रातों में भी दीप जलाता है।
दर्द को कोसोगे तो दर्द और गहरा हो जाएगा,
उससे आँखें फेर लोगे, घाव भी ठहरा रह जाएगा।
कष्ट कोई शत्रु नहीं, जो प्राण लेने आया है,
कभी यह अंतरात्मा को जगाने आया है।
कड़वी दवा का स्वाद भले ही होंठों को अखरता है,
पर उसी के बाद अक्सर रोग भीतर से भागता है।
अपने भीतर एक वैद्य है, जो मौन बैठा रहता है,
हर घाव की भाषा समझे, हर आँसू को सहता है।
उसके हाथों की कठोरता से कभी घबराना मत,
वह तुम्हें सँवारता है, उसे पत्थर बताना मत।
उसकी नज़र में करुणा है, उसकी नीयत में उपचार,
वह पीड़ा के रास्ते से खोलता है मुक्ति के द्वार।
जिस प्याले में औषधि है, वह मिट्टी भी अनमोल है,
उसकी हर एक बूँद में करुणा का भूगोल है।
विधाता के अश्रुओं से जिसकी मिट्टी गूँथी गई,
वही पीड़ा बनकर तेरी आत्मा में सींची गई।
जो आज तेरे होंठों पर कड़वाहट बनकर छाई है,
कल उसी ने तेरी हिम्मत को नई ऊँचाई दिलाई है।
इसलिए हर कष्ट को जीवन का अभिशाप न मान,
अपने आँसू को कमज़ोरी, अपनी ठोकर को नादान न मान।
दर्द आए तो समझना, कोई परत खुल रही है,
तेरी सोई हुई चेतना भीतर से उठ रही है।
हर घाव में सबक़ है, हर सबक़ में नई उड़ान,
कष्ट अगर तुझे तोड़ता है, तो बन तू अपनी पहचान।
जो पीड़ा में भी प्रेम रखे, वही सच्चा इंसान,
दर्द की राख से जन्मे, सबके जीवन के अरमान।
-रतन कुमार कैथवास
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