जीवन के चप्पू चला-चला, मैंने पार किए ख़्वाब तेरे,
अपनी नींदें हार गया मैं, सजते रहे संसार तेरे।
मौसम की ये कैसी रुसवाई, कैसी तेरी अंगड़ाई है,
मैंने हर धड़कन में तुझको चाहा, तूने कैसी दूरी बनाई है।
मैं करता रहा इंतज़ार तेरा, तू सपनों में खोई रही,
मेरी रातें जागती रहीं, तेरी पलकों पर नींद सोई रही।
मैं चाँद से तेरा पता पूछूँ, तारों से करूँ बात तेरी,
तू अपने ही ख़्वाबों में उलझी, भूल गई सौगात मेरी।
तेरी राहों में दीप जलाए, हवाओं से लड़ता रहा,
तेरी आहट की आस में मैं, हर पल ख़ुद से कहता रहा।
कभी पुरवाई बनकर आ जा, कभी घटा बन छा जा,
मेरे सूने मन के आँगन में, बनकर सावन बरस जा।
तेरी ख़ामोशी के पीछे, कौन-सी कहानी पलती है,
मेरी आँखों में रात उतरती, तेरी सुबह सँवरती है।
मैंने तो हर मोड़ पर सजदे में, बस तेरा नाम लिखा,
तूने अपनी तक़दीर में जाने, किसका पैग़ाम लिखा।
मेरे हिस्से धूप ही आई, तेरे हिस्से छाँव रही,
मेरी आँखें राह निहारें, तेरी दुनिया संगीत रही।
मैंने दरिया पार किए हैं, तेरे साहिल की चाह में,
तूने काग़ज़ की नाव चलाई, अपने ही ख़्वाबों की राह में।
अब भी तेरी याद का बादल, मेरे दिल पर छाया है,
तेरे बिन हर रंग ने जैसे, अपना रंग गँवाया है।
फिर भी तुझसे कोई शिकायत, मेरे लब पर आई नहीं,
तुझ पर दिल हारा है जानाँ, कोई बाज़ी लगाई तो नहीं।
जीवन की पतवार थामे, अब भी तेरा इंतज़ार है,
तेरी एक नज़र की ख़ातिर, दिल आज भी बेकरार है।
तू ख़्वाबों से निकलकर देख, मेरी आँखों की तन्हाई,
मैंने उम्र गुज़ार दी तेरी, तूने ख़बर भी न पाई।
कभी मेरी धड़कन सुन लेना, इसमें तेरी ही रुबाई है,
मैंने उलफ़त में उम्र बिताई, तू कहती है… ये मौसम की रुसवाई है।
-रतन कुमार कैथवास
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