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जो समझ ले दर्द जग का

                
                                                         
                            जिस तरह सावन ये बरसा, प्रकृति टूटकर रोई बहुत क्यों,
                                                                 
                            
बादलों के सीने में आख़िर, दर्द था इतना भरा हुआ क्यों।
बूँद-बूँद में प्रश्न कितने, मिट्टी ने पूछे सभी से,
जो धरा को माँ कहें हम, फिर उसी पर ज़ुल्म क्यों?

हर निवाले पर लिखा क्यों, मेहनतों का नाम होता है,
किसान के पसीने से ही, अन्न का सम्मान होता है।
थालियों में स्वाद भरकर, भूल जाते हैं सभी क्यों,
भूख के उस दर्द में भी, आदमी गुमनाम होता है।

सीख उनसे भी मिलेगी, जो बताते टेढ़ा आँगन,
जिनकी नज़र में दोष केवल, दूसरों का हो प्रदर्शन।
आईना दिखला रहे जो, ख़ुद को भी पहचान लें,
दूसरों को राह देने से, पहले अपना पथ सँवारें।

टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर, पाँव अक्सर डगमगाते,
ठोकरों के बाद ही तो, हौसले आगे हैं जाते।
जो कठिन हालात में भी, मुस्कुराना सीख लेते,
वक़्त के तूफ़ान उनके, रास्ता रोके न पाते।

प्रकृति की हर चोट में भी, एक संदेश छिपा हुआ है,
आँसुओं की हर लड़ी में, एक अनुभव बुना हुआ है।
कौन अपना, कौन पराया, वक़्त सब बतला ही देगा,
जो समझ ले दर्द जग का, उसका जीवन सार्थक हुआ है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

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