बात बढ़ चुकी, सुलझा लो तुम,
अब ये दीप जला लो तुम।
रूठे मौसम की देहरी पर,
थोड़ा सा मुस्का लो तुम।
जो भी टूटा जोड़ न पाए,
इतना तो समझा लो तुम।
चुप्पी ने जो जाल बुना है,
उसको आज हटा लो तुम।
मन की भीगी चौखट पर,
अच्छी याद बिठा लो तुम।
नफ़रत की इस लंबी रात में,
उम्मीदों को सजा लो तुम।
आँसू से इतिहास न लिखना,
हँसकर दर्द छुपा लो तुम।
घाव अगर कुछ गहरे हों तो,
मरहम खुद बना लो तुम।
टूटे रिश्तों की मिट्टी से,
फिर विश्वास उगा लो तुम।
जिनको अपना मान रहे थे,
उनको भी बुला लो तुम।
दिल की सारी धूल झटक कर,
आईना फिर से बना लो तुम।
कल किसने देखा है आखिर,
आज ही उसको मना लो तुम।
साँस-साँस में जो शिकवे हैं,
धीरे-धीरे बहा लो तुम।
रंजिश की इस सूखी डाली,
प्रेम-जल से नहा लो तुम।
जीवन चार दिनों का मेला,
हँसकर इसे निभा लो तुम।
जिसने तुमको दर्द दिया है,
उसको भी दुआ दो तुम।
अपने हिस्से की तन्हाई,
गीतों में ढला लो तुम।
जीत वही जो दिल जीत सके,
इतना हुनर दिखा लो तुम।
बात अभी भी पूरी होगी,
बस पहला कदम बढ़ा लो तुम।
राख तले जो चिंगारी है,
उसको फिर बुझा लो तुम।
बात बढ़ चुकी, सुलझा लो तुम,
अब ये दीप जला लो तुम।
-रतन कुमार कैथवास
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