किस तरह की ज़िद पाल रखी है सूरज ने चाँद से,
हर सुबह उसे आकाश से उतार ही देता है।
मगर चाँद भी हार कहाँ मानता है,
हर रात फिर मुस्कुराकर लौट आता है।
एक फ़क़ीर ने मुझसे कहा…
"आसमान की सबसे बड़ी लड़ाई
रोशनी और अँधेरे की नहीं,
ज़िद और सब्र की होती है।"
मैंने पूछा…
"फिर जीतता कौन है?"
वो बोला…
"जो हर हार के बाद
फिर से लौट आता है।"
मैंने हवाओं से कह दिया है…
दिया जलता रहे।
तुम चाहे जितनी अँधियाँ भेजो,
उसकी लौ का इम्तिहान होता रहे।
क्योंकि मुझे पता है,
हवा का काम बुझाना नहीं,
परखना होता है।
समंदर ने भी एक दिन
साहिल से यही कहा था…
"मैं हर रोज़ तुझसे टकराऊँगा।"
साहिल मुस्कुराया और बोला…
"टकरा लेना,
मगर याद रखना,
मेरी ख़ामोशी तेरी हर लहर से लंबी है।"
ज़िंदगी भी यही सिखाती है…
मुश्किलों से बचकर नहीं,
मुश्किलों को झेलकर इंसान बड़ा होता है।
ऐसी अँधियाँ पैदा करो,
कि हौसलों का असली क़द नज़र आए।
ऐसे तूफ़ान उठाओ…
कि किरदार की जड़ें और गहरी हो जाएँ।
क्योंकि...
जब तक हवाएँ विरोध में न चलें,
परिंदों के पर मज़बूत नहीं होते।
जब तक रात अपनी सारी स्याही न उड़ेल दे,
सुबह का उजाला मुकम्मल नहीं होता।
इसलिए मैंने हवाओं से कह दिया है…
दिया जलता रहे।
और वक़्त से कह दिया है…
इम्तिहान जितने चाहो ले लो।
हम वो लोग नहीं,
जो अँधेरों की शिकायत लिखते हैं,
हम वो लोग हैं
जो एक छोटे-से दीये से
पूरे ज़माने की रात को चुनौती देते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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