उनकी आँखों के गड्ढों में अब तक क्या नमकीन पानी भरा है,
किस दर्द ने उनके चेहरे पर ख़ामोशी का पहरा धरा है।
झुक जाएँ कच्चे नैन के बादल, तो बरसात ठहरती नहीं,
उनकी पलकों के नीचे कोई समंदर आज भी हरा है।
झुकी हुई नज़रों में जैसे कोई टूटा हुआ ख़्वाब है,
होंठों पर ख़ामोशी और आँखों में बेहिसाब सैलाब है।
कौन पढ़ेगा दर्द की इबारत उन भीगी पलकों के पार,
हर आँसू में छिपा हुआ कोई अधूरा-सा जवाब है।
ख़ंजर हो जैसे कोई सपनों का, उनकी नज़र का वार है,
दिल के क़िले पर आज भी उन्हीं की हुकूमत बरक़रार है।
बचकर निकलना चाहूँ भी तो आख़िर कैसे निकलूँ मैं,
उनकी आँखों की ख़ामोशी में मेरा ही इख़्तियार है।
कच्चे नैन के बादल जाने कब तक यूँ झुके रहेंगे,
सीने में दबे हुए तूफ़ान आख़िर कब तक रुके रहेंगे।
जो दर्द ज़ुबाँ तक आ न सका, वो आँखों से बह निकलेगा,
हम टूट भी जाएँ तो हमारे ख़्वाब कहाँ तक छिपे रहेंगे।
उनकी आँखों में नमक है या बिछड़ने का असर है,
हर चमकती बूँद में जैसे कोई गुज़रा हुआ सफ़र है।
मैंने चाहा था कि पढ़ लूँ उनके दिल की सारी कहानी,
एक नज़र उठी तो जाना… दिल भी कितना बेख़बर है।
-रतन कुमार कैथवास
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