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जल्दी में तो बस पकड़ते हैं

                
                                                         
                            अपने गाँव से शहर आने का, भी अपना ही विधान था,
                                                                 
                            
पहले खेतों की मेड़ों से होकर,
हाइवे तक, पैदल पहुँचना पड़ता था।
कभी किस्मत, मेहरबान होती,
तो गन्ने से लदे, किसी ट्रैक्टर पर,
दो पल की, जगह मिल जाती,
और किसान, मुस्कुराकर कह देता…
"आओ भइया, शहर ही तो जाना है।"

हाइवे पर फिर, वही पुरानी दुनिया मिलती,
मिनी बसों का शोर,
ऑटो वालों की आवाज़ें,
और जेब टटोलते हुए,
सफ़र की कीमत का हिसाब।
उस दिन भी,
एक ऑटो में बैठकर,
सिविल लाइंस पहुँच गए थे।
एक मॉल से…
दो-चार जोड़ी कपड़े खरीदे,
कुछ अपनों के लिए,
कुछ अपने लिए,
और कुछ उन सपनों के लिए,
जो गाँव की अलमारी में,
अभी तक तह लगाकर रखे थे।

शाम ढलने लगी थी,
हम लौट ही रहे थे कि,
अचानक सामने से,
कक्कू टकरा गए।
पहले हालचाल पूछा,
फिर हमेशा की तरह,
कंधे पर हाथ रखकर बोले…
"चल, पहले चाय पीते हैं,
बातें रास्ते में नहीं होतीं।"

बगल के ठेले पर,
उबलती केतली ने,
हम दोनों का स्वागत किया।
कुल्हड़ हाथ में आया,
भाप चेहरे तक पहुँची,
और कक्कू ने,
पहला घूँट लेते ही पूछा…
"बेटे… शादी कब पड़ी है?"
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"कक्कू,
कैलेंडर में तारीख़ लिख देने से,
शादियाँ नहीं हो जातीं।


पहले किस्मत को,
दो परिवारों की ,रज़ामंदी लिखनी पड़ती है।"
वो हँस पड़े,
बोले…
"बहुत पढ़-लिख गए हो,
सीधा जवाब नहीं देते।
उम्र निकल रही है,
अब घर में शहनाई भी बजनी चाहिए।"
मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया…,


और सामने भागती, सड़क को देखते हुए कहा…
"कक्कू,
जल्दी में तो लोग
बस पकड़ते हैं,
जीवनसाथी नहीं।
जिस रिश्ते को,
पूरी उम्र निभाना हो,
उसे चुनने में,
थोड़ी देर लग भी जाए,
तो घाटे का सौदा नहीं होता।"
कक्कू कुछ पल चुप रहे,
फिर मुस्कुराकर बोले…
"ठीक कह रहे हो,
कच्चे आम जल्दी तोड़ लो,
तो अचार बनते हैं,
मगर मिठास नहीं मिलती।"

मैंने उनका हाथ दबाया,
किराया दिया,
और फिर उसी हाइवे की ओर लौट पड़ा,
जहाँ हर सफ़र सिखा जाता है…
गाँव से शहर तक पहुँचने में,
सिर्फ़ रास्ते नहीं बदलते,
इंसान की सोच भी,
धीरे-धीरे सड़क बन जाती है।
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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