सितारों में अपना जहाँ खोजती है,
वो चमकते जहाँ में तुझे खोजती है।
ये मेरी आँखें, तेरी यादों में डूबी हुई हैं,
हर रात, तेरे लौट आने की, वजह खोजती हैं।
एक रात छत पर यूँ ही बैठा था मैं,
शहर की आवाज़ें धीरे-धीरे सो चुकी थीं।
आसमान में बिखरे सितारे,
ऐसे लग रहे थे,
मानो किसी ने काली चादर पर,
उम्मीद के दीप टाँक दिए हों।
मैंने एक सितारे से पूछा…
"तुम इतने दूर होकर भी चमक लेते हो,
क्या कभी किसी का इंतज़ार नहीं करते?"
वो कुछ बोला नहीं,
बस और ज़्यादा चमकने लगा।
तब लगा,
शायद इंतज़ार ही उसकी रौशनी का राज़ है।
उसी पल हवा का एक झोंका आया,
तेरी खुशबू का वहम साथ लाया।
मैंने पलटकर देखा,
पीछे कोई नहीं था,
मगर दिल ने कहा…
"कुछ लोग दिखाई नहीं देते,
फिर भी साथ चलते रहते हैं।"
रात आधी बीत चुकी थी।
चाँद पश्चिम की ओर झुक रहा था,
और मेरी आँखें,
अब भी उसी रास्ते को देख रही थीं,
जहाँ से कभी तुम, मुस्कुराते हुए आया करती थीं।
तब समझ आया,
यादें भी अजीब मुसाफ़िर होती हैं।
न दस्तक देती हैं,
न इजाज़त माँगती हैं।
बस किसी ख़ामोश रात में,
दिल की किताब खोलकर बैठ जाती हैं।
सुबह की पहली किरण ने,
जब सितारों को, अपने आँचल में समेट लिया,
मैंने आसमान से नज़रें हटाकर
अपने दिल को देखा।
वहाँ अब भी एक कोना,
सिर्फ़ तेरे नाम से रोशन था।
तब महसूस हुआ…
तुझे, सितारों में ढूँढ़ना, मेरी मजबूरी नहीं,
मेरी आदत बन चुकी है।
क्योंकि कुछ लोग, बिछड़कर भी,
आसमान नहीं बनते,
दिल की धड़कनों का,
सबसे चमकता सितारा बन जाते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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