हवेली में एक “दिया” जलते रहने दिया,
तेरी आँखों की ज़ीनत को, क्या ही कहूँ।
जिसने एक नज़र में सदियों का उजाला कर दिया,
उस हुस्न की इनायत को क्या ही कहूँ।
चाँद भी तेरे चेहरे से उधार लेता है रौशनी,
उसकी हर रात की आव भगत को क्या ही कहूँ।
तेरी ख़ामोशी भी ग़ज़ल-सी सुनाई देती है,
लबों की उस नफ़ासत को क्या ही कहूँ।
जब तू मुस्कुराती है, मौसम सजदे में उतर आते हैं,
फ़िज़ाओं की उस मोहब्बत को क्या ही कहूँ।
तेरी पलकों ने जो ख़्वाब सँभाल रखे हैं,
उन ख़्वाबों की हिमाकत को क्या ही कहूँ।
दिल ने लाख चाहा तुझे एक मिसरा लिख दूँ,
मगर तेरी शख़्सियत की हैसियत को क्या ही कहूँ।
हवेली का “दिया” तो बस एक कोना रोशन करता है,
तेरी आँखों के नूर से जगमगाती क़ायनात को क्या ही कहूँ।
-रतन कुमार कैथवास
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